सर्वप्रथम हम प्राणायाम के बारे में समझने का प्रयास करते हैं।
प्राणायाम का योग में बहुत महत्व है। आदि शंकराचार्य श्वेताश्वतर उपनिषद पर अपने भाष्य में कहते हैं- "प्राणायाम के द्वारा जिस मन का मल धुल गया है वही मनुष्य ब्रह्म में स्थिर होता है।
विवेकानंद इस विषय में अपना मत व्यक्त करते हैं, प्राणायाम के सिद्ध होने पर हमारे लिए अनंत शक्ति का द्वार खुल जाता है। संसार में ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो उसके अधिकार में नहीं आए? जगह से हिलने लगते हैं, क्षुद्रतम परमाणु से वृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते हैं, क्योंकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्य है।
जब प्राणायाम से इतना कुछ हो सकता है तो प्रयोग से मुक्ति बहुत छोटी बात है।
प्राणायाम योग के आठ अंगों में से एक है। अष्टांग योग में आठ प्रक्रियाएं होती हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
प्राणायाम = प्राण + आयाम । इसका अर्थ है - प्राण या श्वसन को क्रिएट करना मौखिक या फिर जीवनी शक्ति को क्रिएट करना। प्राणायाम का अर्थ है श्वास को नियंत्रित करना | परंतु स्वास को कम करना नहीं होता है प्राण या श्वास के आयाम या विस्तार ही प्राणायाम हैं |
हठयोगप्रदीपिका के अनुसार प्राणायाम के विभिन्न भेद हैं -
सूर्यभेदन, उज्जायी, शीतली, शीतली, भस्त्रिका, भ्रमरी, मूर्च्छा और प्लाविनी ये आठ प्रकार के प्राणायाम होते हैं।
यह प्राण-शक्ति का प्रवाह कर व्यक्ति को जीवन शक्ति प्रदान करता है।
हठयोगप्रदीपिका के अनुसार-
चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥
अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वयं: निश्चल हो जाता है और योगी स्थाणु हो जाता है। इसलिए योगी को स्वांसों का नियंत्रण करना चाहिए।
यह भी कहा है-
यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिः ततो वायुं निरोधयेत् ॥
जब तक शरीर में वायु है तब तक जीवन है। वायु का निकलना ही मरण है। इसलिए वायु का निरोध करना चाहिए।
सावधानियाँ
पहली तीन बातों की आवश्यकता है, विश्वास,भावना, भिन्न।
प्राणायाम करने से पहले हमारा शरीर अंदर और बाहर से शुद्ध होना चाहिए।
सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन किसी भी आसन में बैठें, मगर जिसमें आप अधिक देर तक बैठ सकते हैं, उसी आसन में बैठें। रीढ़ को सीधा रखें और शरीर को तनाव मुक्त रखें।
प्राणायाम करते समय हमारे हाथों को ज्ञान या किसी अन्य मुद्रा में जाना जाएगा। या फिर गोद में रखें, बायां हाथ पर दायां हाथ रखें।
प्राणायाम करते समय हमारे शरीर में कहीं भी किसी भी प्रकार का तनाव नहीं होना चाहिए, यदि तनाव में प्राणायाम करेंगे तो उसका लाभ नहीं मिलेगा।
प्राणायाम करते समय अपनी शक्ति का ना करें। यानी खुद के साथ ज्यादा जबरदस्ती न करें।
हर सांस का होना बिल्कुल आराम से होना चाहिए।
जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप की शिकायत है, उन्हें अपना रक्त-चाप सामान्य होने के बाद धीमी गति से प्राणायाम करना चाहिए।
यदि आक्षेप हुआ हो तो, छह महीने बाद ही प्राणायाम का धीरे-धीरे अभ्यास करें।
हर सांस के आने के साथ ही मन ही मन में ओम का या सोऽहं का जाप करें। श्वास लेते हुए "स" और प्रदर्शन करते हुए "हं" का जप कर सकते हैं। हालांकि नहीं तो भी कर सकते हैं।
ओम् का जाप का उपचार करने से हमारे पूरे शरीर मे (सिर से ले कर पैर के अंगूठे तक) एक कंपन होता है जो हमारे अंदर की नकारात्मक एनर्जी को बाहर निकल के मन और आत्मा को शुद्ध करता है।
अब तक हम प्राणायाम के बारे में समझा, अगले लेखों में प्राणायाम करने की विधियों पर चर्चा करेंगे।
तब तक के लिए धन्यवाद।😊🙏
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